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"रह जाता कोई अर्थ नहीं" by the legendary Rashtrakavi Ramdhari Singh 'Dinkar' Ji.

Reh Jata Koi Arth Nahin -  by the legendary Rashtrakavi Ramdhari Singh 'Dinkar' Ji.
"रह जाता कोई अर्थ नहीं" by the legendary Rashtrakavi Ramdhari Singh 'Dinkar' Ji.

 "रह जाता कोई अर्थ नहीं" by the legendary Rashtrakavi Ramdhari Singh 'Dinkar' Ji.

जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि जिसे पाने की चाह हमें बरसों रहती है, जब वह हासिल होता है तब तक वक्त हाथ से निकल चुका होता है और उसका मोल खत्म हो जाता है। ठीक वैसे ही, कई बार कोई अनमोल शख्स हमारे बेहद करीब होता है, पर उसकी अहमियत का एहसास हमें उसके दूर जाने के बाद ही होता है। मानव मन के इन्हीं गहरे अंतर्द्वंद्वों को जीवंत करती, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की यह मर्मस्पर्शी कविता प्रस्तुत है.


The deeply philosophical and powerful poem "रह जाता कोई अर्थ नहीं" by the legendary Rashtrakavi Ramdhari Singh 'Dinkar' Ji.

This piece shifts away from Dinkar Ji’s usual fiery, revolutionary Veer Ras (heroic style) and dives into Shant and Karun Ras—exploring life's ultimate truths, time, and the fading value of actions once the right moment passes.



Ramdhari Singh 'Dinkar' Ji.


नित जीवन के संघर्षों से

जब टूट चुका हो अन्तर्मन,

तब सुख के मिले समन्दर का

*रह जाता कोई अर्थ नहीं*।।

 

जब फसल सूख कर जल के बिन

तिनका -तिनका बन गिर जाये,

फिर होने वाली वर्षा का

रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

 

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन

यदि दुःख में साथ न दें अपना,

फिर सुख में उन सम्बन्धों का

रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

 

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण

निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,

फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का

रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

 

मन कटुवाणी से आहत हो

भीतर तक छलनी हो जाये,

फिर बाद कहे प्रिय वचनों का

रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

 

सुख-साधन चाहे जितने हों

पर काया रोगों का घर हो,

फिर उन अगनित सुविधाओं का

रह जाता कोई अर्थ नहीं।।

 

-राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर

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